Maa
मां मैं जब भी हारती टूटती हूं,
तू मुस्कुराती मेरे सामने आ जाती है।
तेरी परछाई हु में ये एहसास मुझको,
हर वक़्त करवाती है।
इनका गुस्सा हस कर झेलूँ,
या बच्चो को कुछ अच्छा खिलाने पापड़ बेलू।
थक कर जब बिस्तर पर लेटु,
तो कमर की अकडन तेरी याद दिलाती है।
हमेशा तुमको पूछती थी में क्यों,
खुद के लिए नही जीती हो,
क्यों फटी हुई साड़ी सीती हो,
क्यों हमारे लिए रातो को जागती हो,
क्यों तुम काम से नही भागती हो,
क्यों पापा की डांट खाती हो,
क्यों रोज़ रोज़ अपना सम्मान गवाती हो,
क्यों तबीयत खराब होने पर भी करती हो काम,
क्या तुमको अच्छा नही लगता आराम।
और तुम प्यार से फेर कर बालो में हाथ,
देती थी बस यही जवाब,
जब तुम माँ बन जाओगी तब सब समझ जाओगी।
हा माँ आज में सब समझ गयी हु,
माँ में तुम बन गयी हु,
हा माँ अब मैं माँ हो गयी हु।।
Words touches heart somewhere in deep
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