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कार नहीं संस्कार भी दे

हमारे बच्चे जीवन के अनमोल निधि होते हैं बच्चों का इस दुनिया में आना बच्चों की नहीं हमारी नियति होती है बचपन से ही उनके हर सुख दुख हर दर्द का एहसास एक मां बाप से अधिक कोई नहीं कर सकता लेकिन कई बार ऐसा होता है कि उनको अधिक सुख देने की जहां में हम उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने लगते हैं बच्चे का भविष्य बनाने के लिए उसका वर्तमान संभालना बहुत जरूरी है आजकल दिखावे की होड़ में हम अपने बच्चों को वह सब कुछ देना चाहते हैं जो दूसरे के पास है लेकिन हमारी सर्वप्रथम जिम्मेदारी है कि पहले हम उससे इस योग्य बनाए कि वह हमारी दी हुई सुविधाओं का अनुचित प्रयोग ना करें अगर आप काम करके थक गए हैं और आपका बच्चा आपके पास प्यार से आकर आपको यह पूछा लाओ मां या लाओ पापा मैं आपकी मदद करूं तो समझ लीजिए उसमें संस्कार अभी जिंदा है।। एक बार की बात है हम दिल्ली एयरपोर्ट से आ रहे थे रात का समय था मेरे दोनों छोटे बेटे हमारे साथ थे डाइवर गाड़ी चला रहा था मेरे हस्बैंड आगे बैठे हुए थे हमारे आगे गाड़ी जा रही थी जिसमें शायद कोई रईसजादा था वह तेज गाड़ी दौड़। रहा था ड्राइवर ने दो बार गाड़ी साइड भी की लेकिन वह तभी बहुत तेजी से जा ...

जिंदगी की पाठशाला

 इस लाक डाउन की अवधि में जिंदगी ने बहुत से लोगों को बहुत से सबक सिखाएं जो अपने परिवारों से दूर थी वह लौट लौट कर घर को आए आदमी सुबह निकल जाता था रात को घर में आता था उसको शायद पता भी नहीं होता होगा कि घर में उसके पीछे कितना कुछ चलता रहता है एक स्त्री सुबह से लेकर शाम तक अपना घर सजाती है सबकीसुविधाओं का ध्यान रखती है लेकिन जब एक पति इतने लंबे समय तक अपने घर पर रहा तब से यह एहसास हुआ कि वास्तव में जिंदगी में काम के अलावा भी बहुत कुछ है -तीन दिन तक तो जरा अपने मोबाइल में उलझा रहाअपने आप से लड़ता रहा ।लेकिन धीरे-धीरे उसने समझना शुरू किया ,पत्नी की मदद की, बच्चों को प्रेम किया बच्चों के साथ मिलकर बैठे गेम खेलें बहुत सारी बातें साझा कीं और वह बच्चे भी जो शायद जिंदगी की भाग दौड़ में अपना करियर बनाने के लिए बाहर नौकरियां कर रहे थे पढ़ाई कर रहे थे अपने घरों को लौट कर आए तो एक नया ही वातावरण निर्मित हुआ और इस वातावरण में सारे अपने थे। वही बच्चे अपने माता-पिता के कामों में हाथ बटाते दिखाई देनसामाजिक  स्थिति से भले ही हम दूर हुए हो लेकिन शर्तिया अपने पारिवारिक जीवन में हम एक दूसरे से और ज्...

Maa

मां मैं जब भी  हारती टूटती  हूं, तू मुस्कुराती मेरे सामने आ जाती है। तेरी परछाई हु में ये एहसास मुझको, हर वक़्त करवाती है। इनका गुस्सा हस कर झेलूँ, या बच्चो को कुछ अच्छा खिलाने पापड़ बेलू। थक कर जब बिस्तर पर लेटु, तो कमर की अकडन तेरी याद दिलाती है। हमेशा तुमको पूछती थी में क्यों, खुद के लिए नही जीती हो, क्यों फटी हुई साड़ी सीती हो, क्यों हमारे लिए रातो को जागती हो, क्यों तुम काम से नही भागती हो, क्यों पापा की डांट खाती हो, क्यों रोज़ रोज़ अपना सम्मान गवाती हो, क्यों तबीयत खराब होने पर भी करती हो काम, क्या तुमको अच्छा नही लगता आराम। और तुम प्यार से फेर कर बालो में हाथ, देती थी बस यही जवाब, जब तुम माँ बन जाओगी तब सब समझ जाओगी। हा माँ आज में सब समझ गयी हु, माँ में तुम बन गयी हु, हा माँ अब मैं माँ हो गयी हु।।

आशा का केन्द्र

गौरवान्वित हूं कि मैं बेसिक स्कूल में अध्यापिका हूं  मेरे विद्यालय के बच्चे आशान्वित है भयभीत नहीं है अभिभावक फीस हेतु बस प्रतीक्षारत है विद्यालय खुलने के लिए हमारी रसोईया व्यवस्था कर रही है लाखों भूखों के लिए मेरे बच्चों की खिलखिला हटे फिर लौट आएंगी जिंदगी हमारे विद्यालय में फिर मुस्कुराए गी  हां संबलआर्थिक तो है पर, उससे कहीं ज्यादा मानसिक संतुष्टि प्रदान कर जाते हैं जब विचार मन में यह आते हैं कि जिन्हें कोई नही पढाता  उन्हे हम पढ़ाते हैं  गौरवान्वित हूं कि मैं बेसिक स्कूल में अध्यापिका हूं इँँदु सिंह
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